
कमरछठ पर माताएं रखती है हलषष्ठी व्रत, संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना, पसहर चावल और छह प्रकार की भाजियों से होती है पूजा, जानिए क्या है हलषष्ठी व्रत का महत्व और पूजन विधि…
कमरछठ पर माताएं रखती है हलषष्ठी व्रत, संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना, पसहर चावल और छह प्रकार की भाजियों से होती है पूजा, जानिए क्या है हलषष्ठी व्रत का महत्व और पूजन विधि…
जांजगीर-चांपा:- संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और कुशलता की कामना को लेकर माताएं हलषष्ठी का व्रत रखती हैं। छत्तीसगढ़ में इस पर्व को आमतौर पर कमरछठ के नाम से जाना जाता है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व में महिलाएं दिनभर व्रत रखकर हलषष्ठी माता की पूजा-अर्चना करती हैं और संतान के मंगल की कामना करती हैं।
हलषष्ठी व्रत का महत्व…धार्मिक मान्यता के अनुसार हलषष्ठी का संबंध भगवान बलराम से है। भगवान बलराम का प्रमुख शस्त्र हल और मूसल था, इसलिए उन्हें हलधर भी कहा जाता है। इसी कारण इस पर्व को हलषष्ठी के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। नवविवाहित महिलाएं भी संतान प्राप्ति की कामना से यह व्रत करती हैं।
इसलिए खास है पसहर चावल…हलषष्ठी की पूजा में बिना हल जोते उगने वाले पसहर चावल का विशेष महत्व माना जाता है। इसके साथ छह प्रकार की भाजियों का भोग लगाया जाता है। पूजा में चना, जौ, गेहूं, धान, अरहर, मक्का और मूंग सहित विभिन्न अनाज अर्पित किए जाते हैं। भुने हुए चने और जौ की बालियां भी पूजा में चढ़ाई जाती हैं।
ऐसे की जाती है पूजा…हलषष्ठी के दिन महिलाएं सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद घर या पूजा स्थल पर गोबर से जगह को लीपकर एक छोटा तालाब बनाया जाता है। इसमें पलाश और कांसी की टहनियां लगाकर हलषष्ठी माता की पूजा की जाती है। महिलाएं विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद हलषष्ठी व्रत की कथा सुनती हैं।
परंपरा के अनुसार इस व्रत में भैंस के दूध, दही और घी तथा पसहर चावल का सेवन किया जाता है, जबकि गाय के दूध, दही और घी का सेवन नहीं किया जाता। पूजा के बाद माताएं अपनी संतान को तिलक लगाकर और कंधे के पास चंदन की पोतनी लगाकर उनके सुखी, स्वस्थ और दीर्घायु जीवन का आशीर्वाद देती हैं। इस तरह हलषष्ठी या कमरछठ का पर्व मातृत्व, संतान के प्रति प्रेम और उनकी मंगलकामना से जुड़ी छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण लोकपरंपराओं में से एक है।



